Dhananjay Rai wrote an article on the "Politics for "small states"" in the Hindi newspaper, Jansatta. A tabulation of the arguments in English is presented by Parimal Maya Sudhakar here. Parimal also answers some of the points made. The article in Hindi is presented here.
पृथक प्रदेशों के लिए राजनीति
धनंजय राय
1947 से पहले स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राष्ट्रवाद का निर्माण बहुयामी परिकल्पनाओं से प्रेरित हुआ. इनमे सबसे महत्वपूर्ण कल्पना राष्ट्र राज्य से सम्बंधित थी. राष्ट्र राज्य को स्वतंत्र करते हुए, गठित और विकसित करना महत्वपूर्ण मुददे थे. तीनों ही संप्रभुता से जुड़े हुआ थे. पराधीनता से मुक्ति इनमें से प्रमुख थी. यहाँ दो महती प्रश्न उठते थे: क्या सिर्फ राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र हो या फिर हर प्रकार से? अंबेडकर ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता पर जोर डालते हुए दूसरे प्रश्न को महत्ता दी. लेकिन राजनीतिक स्वतन्त्रता सभी के लिए जरुरी थी क्योंकि यह विकास के लिए प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण कारक मानी गयी. लेकिन 1947 के कुछ ही वर्षो के बाद, राष्ट्र राज्य को एक मात्र विकास की इकाई माने जाने का भ्रम टूट गया. सबसे पहल यह मिथक टुटा कि राष्ट्र राज्य का गठन हो चूका है और यही एक मात्र विकास की इकाई है. इसके बाद, राष्ट्र राज्य की जगह, विभिन्न प्रदेशों ने विकास या अल्प विकासकी इकाई के रूप में खुद पर जोर डाला.
इसके तीन चरण रहे हैं. पहला चरण , प्रदेशों के विकास और अल्प विकासको भाषा से जोड़ कर देखा गया. दूसरे शब्दों में , विभिन्न प्रदेशों के अल्प विकासका सबसे महत्वपूर्ण कारण उनके साथ भाषा के आधार पर भेदभाव् को माना गया. इसको मशहूर राजनीति शास्त्री मेरोन वीनर के भूमिपुत्रों के उदभव के सिद्धांत से समझा जा सकता हैं. इसके अनुसार , विकास से दूर कर दिए गये बहुत सारे समुदाय अपने को पृथक मानते हुए राजनीति एवं आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं.
भाषाई आधार पर आन्ध्र का पुनर्गठन करते हुआ तेलंगाना, जहा पर दोनों क्षेत्रो कि भाषा तेलुगु थी, को इसमें जोड़ा गया . बम्बई राज्य का गठन करते हुए इसमें नागपुर मंडल के जिले, जो की मध्य प्रदेश के हिस्सा हुआ करते थे, और हैदराबाद के मराठवाड़ा क्षेत्र को जोड़ा गया. केरल के सन्दर्भ में, त्रावणकोर-कोचीन राज्य को मद्रास राज्य के मालबार जिले के साथ विलय कर दिया गया. 1969 में, मद्रास राज्य को तमिलनाडु कर दिया गया. मैसूर का गठन कूर्ग राज्य , दक्षिणी महाराष्ट्र और पश्चिमी हैदराबाद के कन्नड़ जिले को विलय कर के किया गया. 1973 में इसका नाम कर्नाटक कर दिया गया. उड़ीसा में भी भाषाई आधार पर क्षेत्र जोड़े गए. बम्बई पुनर्गठन अधिनियम , दिसम्बर 1, 1963, के द्वारा गुजरात और महाराष्ट्र भाषाई भिन्नता के आधार पर अस्तित्व में आये. नागालैंड का गठन दिसम्बर 1, 1963 को किया गया. पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 के माध्यम से पंजाब और हरियाणा का गठन हुआ. पंजाब के उत्तरी हिस्से को काटकर हिमाचल प्रदेश बनाया गया जिसको जनवरी, 25, 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला. मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा भी जनवरी 21, 1972 को अस्तित्व में आये. अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम का गठन , फ़रवरी 20 , 1987 में हुआ.
भाषाई आधर पर विकासवाद का यह एक महत्वपूर्ण दौर रहा है . इस दौर में भाषा और विकास को एक दूसरे का पर्यायवाची मान लिया गया था. किसी एक क्षेत्र का अल्प विकास उसके भाषा के साथ सौतेला व्यवहार के रूप में देखा गया. क्षेत्र का विकास भाषा की उन्नति के साथ देखा गया. यह दौर उस रूप में आज शायद महत्वपूर्ण नहीं रहा गया है. इसका सबसे बड़ा कारण भाषा के आधार पर अस्तित्व में आये प्रदेशों के अन्दर दृष्टिगोचर कई अंतर्विरोध होते रहे हैं. सबसे बड़ा अंतर्विरोध किसी एक राज्य के अन्दर सभी क्षेत्रों का असमान और गैरआनुपातिक विकास हैं. बहुत सारे क्षेत्रो को विकास से ही दूर कर दिया गया . पूरे प्रदेश के एकभाषी होते हुए भी उसके अन्दर विभिन्न क्षेत्र विकास से अछूते रहे.
इसने दूसरे चरण को जन्म दिया है. जहाँ पर विकास को भाषा से अलग करते हुए क्षेत्र पर केन्द्रित कर दिया गया है. एक भाषा के आधार पर एकता को ही सबका विकास नहीं माना जा रहा है. मुद्दा भाषा से क्षेत्र विकास कि तरफ चला गया है. इसी आधार पर छत्तीसगढ़ ,उत्तराचल (बाद में उत्तराखंड ) और झारखण्ड राज्य का गठन नवम्बर, 2000 में किया गया. इसी आधार पर बहुत सारे पृथक प्रदेशों की मांगे की जा रही है. मसलन, तेलंगाना (आंध्र प्रदेश में), सीमांचल (बिहार में ), मरू (राजस्थान में ), बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और कुछ मध्य प्रदेश के हिस्से ), पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश और बिहार के हिस्से), बोडोलैंड (असम में) , गोरखालैंड और कामतापुर (पश्चिम बंगाल में), विदर्भ (महाराष्ट्र में ), सौराष्ट्र (गुजरात में ), कोडागु (कर्नाटक में ), तुलुनाडू (कर्नाटक और केरल में ) और विन्ध्य प्रदेश (मध्य प्रदेश ) इत्यादि प्रमुख मांगे हैं.
इस तरह की मांगो का सरलीकरण करना आसान नहीं हैं. सतही तौर पर ये सभी क्षेत्र विकास को मुद्दा बनाते हुए एक पृथक राज्य के निर्माण के लिए जोर दे रहे हैं, हालांकि ऐसा प्रतीत नहीं होता हैं. ईस मुद्दे का कई स्वरुप हैं. पहला, वास्तव में कुछ कुछ क्षेत्र रहे हैं जहा पर विकास नहीं हुआ है. वहां पर आम जन भावनात्मक रूप से , पृथक राज्य के सवाल पर एक जुटता दिखाते हैं. दूसरा, पृथक प्रदेशों की आड़ में यह कुछ दबंग जातियों और वर्गो का एक दुसरे रूप में उदय भी हैं. दबंग जातियां लोकतंत्र को एक दूसरे रूप में ही स्वीकार कराती हैं. चूँकी ये संख्या बल में कम हैं इसलिये लोकतन्त्र को अपनाने के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं हैं. बड़े प्रदेशों में , इन दबंग जातियों का सत्ता में उदय बहुत ही समझौतावादी प्रतीत होता है. इसका कारण है इनकी की सीमित संख्या जिसके के बल पर ये बहुत बड़े स्तर पर राजनीतिक सत्ता को प्रभावित नहीं कर पाती हैं. बड़े प्रदेशों में , जनता के एक बड़े आकर ने दबंग जातियों को समझौतावादी रुख आपनाने के लिए तत्पर किया है. कितना तत्पर किया है यह विवेचना का प्रश्न है.
छोटे प्रदेशों के गठन से दबंग जातियों को कुछ हद तक स्वतंत्र कार्य करने की जगह मिलती है . इसका सबसे बड़ा कारण, उस क्षेत्र में इन जातियो का तुलनात्मक रूप से थोडा ज्यादा संख्या में होना है. साथ ही साथ, आर्थिक रूप से सबल होने के कारण और इनका दबंग इतिहास होने के कारण इन क्षेत्रो में प्रभाव रहा है. इन दबंग जातियों के लिए छोटे प्रदेश सत्ता प्राप्त करने के साथ साथ ही सामाजिक और आर्थिक प्रभाव को अक्षुण्ण रखने का भी एक जरिया है. इसका सबसे बड़ा और जीता जागता उदहारण हरियाणा में मिलता है. यद्दपि वहाँ पर राज्य का गठन भाषा के आधार पर हुआ था, लेकिन गठन के बाद से ही , राजनीतिक सत्ता , आर्थिक और सामाजिक प्रभाव में किस तरह से एक ही जाति का प्रभुत्व रहा है, यह सोचने के बात है. इसी मॉडल को कई दबंग जातियां बहुत सारे क्षेत्रो में अपनाना चाहती हैं. इसके अलवा, वैश्वीकरण के दौरान बुर्जुआ की प्रकृति में आये परिवर्तन को छोटे प्रदेशों के गठन की मांग से अलग नहीं किया जा सकता है. 1991 के बाद, निसंदेह बुर्जुआ की प्रकृति में परिवर्तन आया है. यह परिवर्तन बुर्जुआ के क्षेत्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर उदय के साथ दिख सकता हैं. पहले बड़े स्तर पर बुर्जुआ, कुछ ही क्षेत्रो से आते थे और उनकी संख्या कम थी. लेकिन जिस तरह से अरबपतियों की संख्या बढ़ी हैं और विभिन्न जगहों पर फैली हैं , वह अभूतपूर्व है. बुर्जुआ का जिस तरह से क्षेत्रीकरण हुआ है, वह प्रदेशों की मांगो के रूप में उनका अभ्युदय दिखता हैं. बहुत ज्यादा छोटे प्रदेशों की मांग, क्षेत्रीय बुर्जुआ का उभार है. अतः इस चरण को कुछ हद तक लोगो के स्वाभाविक और वास्तविक मांग के वावजूद, दबंग जातियो और क्षेत्रीय बुर्जुआ का उभार माना जा सकता है.
तीसरा चरण एक नयी राजनीति को जन्म देता है. यहाँ पर , विकास और क्षेत्रीयता में सम्बन्ध पिछड़ेपन को लेकर नहीं है. दूसरे, शब्दों में , कई क्षेत्र कई प्रदेशों के भीतर ही बेहतर विकसित हो गए हैं. यहाँ पर संसाधन कई कारणों से उपलब्ध है. इन क्षेत्रों की समस्या उनका पिछड़ापन नहीं बल्कि उनका विकसित अवस्था में होना है. ये क्षेत्र उसी राज्य के अविकसित क्षेत्रों के साथ कोई भी आर्थिक , राजस्व और बुनियादी सुविधाओ से जुड़े सम्बन्ध नहीं रखना चाहते है. हरित प्रदेश की मांग इसी नजरिया का एक उदहारण है. इस तरह की मांगों की अगुवाई करने वाले और दूसरे चरण के नेतृत्व में एक बुनियादी फरक है. दूसरे चरण में जो दबंग जातियां और वर्ग अलग राज्य की मांग उठाती हैं, वो क्षेत्रों के पिछड़ेपन के माध्यम से अपने उभार को प्रस्तुत करती है. लेकिन , तीसरे चरण में, यह सीधा सीधा खुला प्रदर्शन है और इनके लिये ये प्रशासन जैसे तर्क का इस्लेमाल करते हैं. इनके दो तर्क प्रशासन के सन्दर्भ में होते है. पहला, बड़े प्रदेश प्रशासन के दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराए जा सकते हैं और दूसरा , उनके कई क्षेत्रों क्षेत्रो में प्रशासन की अनुपलब्धता या कमजोरी के कारण विकास बहुत तेजी से नहीं हो पा रहा है. अगर कोई अजित सिंह की बातो पर गौर करे तो, ये बाते स्पष्ट हो जाती हैं. लेकिन क्या यह सच हैं ? बिलकुल नहीं. प्रशासन जैसी बाते गौर करें तो ये लोग वाकई यह भूल जाते हैं कि अगर प्रशासन संभव नहीं होता तो उनका ही क्षेत्र क्यों विकसित हुआ ! मुख्य मुद्दा हैं यह एक खुलेआम दबंग जातियो का उभार की तरफ इंगित करता है जो अलग राजनीतिक सत्ता के साथ साथ विकास को भी 'विशेष' अधिकार के तहत अपने पास रखना चाहती है.
अलग-अलग प्रदेश की मांग के लिये जितनी तेजी अभी मची है क्या ये संकेत नहीं देते हैं के दबंग जातियों और बुर्जुआ के उभार का ठोस जवाब निश्चित तौर पर , अलग प्रदेशों के गठन के माध्यम नहीं दिया जा सकता है. बड़े प्रदेशों में दबंग जातियों और बुर्जुआ का प्रभाव् कम हो गया हैं, यह भी सच नहीं हैं. लेकिन , छोटे प्रदेश इनकी स्थिति को निसंदेह मजबूत ही करेंगें.