मेरा साफ मानना है कि प्रसेनजीत बोस या इस जैसे तमाम खुद को बुद्धिजीवी कहने वाले लोगों को पार्टी का पोस्टर-बैनर ढोने और नारा बनाने के काम में लगा देना चाहिए। जो लोग जनता को नहीं समझ सकते, वे किसी राजनीतिक पार्टी का एक अच्छा सदस्य भी नहीं साबित हो सकते। या तो संसदीय राजनीति और उसके तकाजों को समझिए या फिर जंगल में जाकर माओवादियों की तरह "संघर्ष" कीजिए। प्रणब मुखर्जी के मुद्दे पर इस तरह हायतौबा मचाने वालों का जमीर नंदीग्राम, सिंगूर, सलेम ग्रुप को जमीन देने जैसे दूसरे मुद्दों पर नहीं जागा। तब शायद ये लोग मेच्योर नहीं थे। अब मेच्योर हो गए हैं। तो ठीक है, अब अपने-अपने दड़बों में आराम कीजिए। आपका यह वितंडा एक-दो महीने की कबड्डी का खेल है। फिर किसी एनजीओ या दूसरे लाभकारी संस्थाओं में जाकर मोटी तनख्वाह की नौकरी कीजिए, जेएनयू से पढ़ाई के बदले महीने का पैसा लेकर तमाम निओ-लिबरल तीर्थों-मंदिरों में जाकर ऐश कीजिए और सिद्धांत को कोयले के चूल्हे पर पका कर पटरी पर रख कर बेचिए... और आराम की नींद सोइए...। बहुत अच्छी नींद आप सबका इंतजार कर रही है...
प्रसेनजीत बोस
मेरा साफ मानना है कि प्रसेनजीत बोस या इस जैसे तमाम खुद को बुद्धिजीवी कहने वाले लोगों को पार्टी का पोस्टर-बैनर ढोने और नारा बनाने के काम में लगा देना चाहिए। जो लोग जनता को नहीं समझ सकते, वे किसी राजनीतिक पार्टी का एक अच्छा सदस्य भी नहीं साबित हो सकते। या तो संसदीय राजनीति और उसके तकाजों को समझिए या फिर जंगल में जाकर माओवादियों की तरह "संघर्ष" कीजिए। प्रणब मुखर्जी के मुद्दे पर इस तरह हायतौबा मचाने वालों का जमीर नंदीग्राम, सिंगूर, सलेम ग्रुप को जमीन देने जैसे दूसरे मुद्दों पर नहीं जागा। तब शायद ये लोग मेच्योर नहीं थे। अब मेच्योर हो गए हैं। तो ठीक है, अब अपने-अपने दड़बों में आराम कीजिए। आपका यह वितंडा एक-दो महीने की कबड्डी का खेल है। फिर किसी एनजीओ या दूसरे लाभकारी संस्थाओं में जाकर मोटी तनख्वाह की नौकरी कीजिए, जेएनयू से पढ़ाई के बदले महीने का पैसा लेकर तमाम निओ-लिबरल तीर्थों-मंदिरों में जाकर ऐश कीजिए और सिद्धांत को कोयले के चूल्हे पर पका कर पटरी पर रख कर बेचिए... और आराम की नींद सोइए...। बहुत अच्छी नींद आप सबका इंतजार कर रही है...